सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरक्षित वर्ग चाहे आयु की, फीस की, स्थान की या आय आदि में छूट पता है, परंतु यदि वो ३५ वर्ष की आयु में २३ वर्ष की आयु के अनारक्षित व्यक्ति से एक नंबर अधिक लता है, तो उसे अनारक्षित सीट लेने का अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट जी, आप एक बिल लाइए जिसमें यह व्यवस्था हो कि दलित केवल फॉर्म भर दे, और उसे किसी दलित/अंबेडकर/फुले आदि नाम के NGO से एक सर्टिफिकेट मिल जाए कि इस बार ये नौकरी उसे मिले, तो उसे परीक्षा आदि देने की आवश्यकता नहीं।
लोग कहेंगे कि सुप्रीम कोर्ट बिल कैसे ला सकता है! भाई सुप्रीम कोर्ट इस देश में बिल, साँप, स्कोडा, लहसुन सब ला सकता है। वो संसद के कानून पलट देते हैं, तो बनाना क्या चीज है। नौकरियों को जाति-आधारित चुनाव से देना चाहिए।
परीक्षा की तैयारी करना एक मानसिक भार है ऐसे दलित-पीड़ित-शोषित-वंचित समाज के लोगों पर। उन्हें ना तो जल पीने दिए गया, ना जीने दिया गया, ऐसे में परीक्षा भवन में बुलाना एक अपराध घोषित कर दीजिए। आप सोचिए कि कोई दो साँस हायड्रोजन, एक साँस ऑक्सीजन खींच कर, फेफड़े से पेट में पानी बना रहा हो, उसके इतना विज्ञान जानने के उपरांत भी उसे परीक्षा में बैठना पड़ेगा?
35 वर्ष तक वो तैयारी करता है, क्या इसी आधार पर यह न माना जाए कि उसने पढ़ने लायक सब पढ़ लिया होगा? दूसरी बात, अंबेडकर जी ने 64 मास्टर्स की डिग्री ले ली, क्या यह काफी नहीं है? जब सवर्णों की भूमि ट्रांसफर हो सकती है, तो क्या अंबेडकर जी की डिग्री को पूरे दलित समुदाय का सामूहिक अधिकार न माना जाए?