#Selective_Outrage : पहचान जब “सुविधाजनक” हो तभी स्वीकार्य!
एक दलित नेता ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए घर के सामने बड़ा-सा बोर्ड लगवाया—
“The Great #####”
तालियाँ बजीं, कैमरे चमके, इसे
#self_respect और
#assertion का नाम दिया गया।
एक
#CRPF की महिला सिपाही ने सरेआम कंगना रनौत को मीडिया उसे “Farmer’s Daughter” बताकर देवीकरण में जुट गया।
कानून, वर्दी, अनुशासन—सब कुछ सेकेंडरी हो गया।
#Primary बना
#identity_narrative।
आज अगर वही लड़की यह कह देती कि—
मैं जाट, गुज्जर, अहीर, किसान, अशोक या शिवाजी की वंशज हूँ,
तो
#timeline पर
#flower_shower चल रहा होता।
Hashtags ट्रेंड कर रहे होते—
#BraveDaughter #PrideOfCommunity
अगर कह देती—
“मैं बाबा साहब की बेटी हूँ”,
तो उसे
#Constitution_Defender घोषित कर दिया जाता।
मोमबत्तियाँ जलतीं, भाषण होते, पुरस्कारों की लाइन लग जाती।
लेकिन उसने सिर्फ इतना कहा—
“मैं ठाकुर हूँ।”
बस…
यहीं से वह
#villain बना दी गई।
यहीं से उसे सामंतवादी, मनुवादी,
#regressive_symbol करार दे दिया गया।
यानी पहचान तब तक ठीक है
जब तक वह आपकी
#political&convenience में फिट बैठे।
जैसे ही पहचान आपकी तय स्क्रिप्ट से बाहर निकली—
आपका
#moral_compass घूम जाता है।
इसे ही कहते हैं—
#Selective_Outrage.
यह न सामाजिक न्याय है,
न प्रगतिशील सोच।
यह सिर्फ और सिर्फ
Hypocrisy with English vocabulary है।
बाक़ी सब…
शब्दों का शोर,
और सोच का दिवालियापन।
अनूप नारायण जी की पोस्ट