भारतीय प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही की कमी लंबे समय से एक बड़ी समस्या रही है. लेकिन रेलवे द्वारा “नॉन-परफॉर्मेंस” के आधार पर 6 अधिकारियों को समय से पहले रिटायर करने का फैसला एक सिस्टमेटिक बदलाव का संकेत देता है.
यह सिर्फ 6 लोगों की रिटायरमेंट नहीं है, यह एक मैसेज है.
👉 “सरकारी का मिथक टूट रहा है
👉 परफॉर्म नहीं करोगे तो बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा
👉 देश के पैसे पर चलने वाली व्यवस्था में जवाबदेही तय होगी
भारतीय रेलवे जैसे विशाल संगठन में यह कदम खास इसलिए है क्योंकि यहाँ पर वर्षों से “फाइल मूवमेंट” और “धीमी कार्यसंस्कृति” की आलोचना होती रही है. ऐसे में यह निर्णय एक डर और अनुशासन दोनों पैदा करेगा.
अगर इस मॉडल को अन्य मंत्रालयों और विभागों में भी लागू किया गया, तो:
फाइलों की गति बढ़ेगी
निर्णय लेने में देरी कम होगी
“काम चलाऊ” मानसिकता खत्म होगी
और सबसे महत्वपूर्ण, ईमानदार व मेहनती अधिकारियों को प्रोत्साहन मिलेगा
यह कदम वास्तव में “परफॉर्म या परिश” (Perform or Perish) की संस्कृति की शुरुआत हो सकता है.
सरकारी तंत्र में सुधार के लिए सिर्फ नीतियाँ नहीं, कठोर फैसले जरूरी होते हैं, और यह उन्हीं में से एक है.
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या यह एक isolated action रहता है या पूरे प्रशासनिक ढांचे में accountability revolution की शुरुआत बनता है.