मैंने सदन में अपनी बात रखते हुए स्पष्ट किया कि सरकार 'नशा मुक्त भारत' के बड़े दावे तो करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत आज भी बेहद चिंताजनक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देशभर में केवल 76 आउटरीच एंड ड्रॉप-इन सेंटर (ODIC) संचालित हो रहे हैं, जो हमारी विशाल आबादी और समस्या की भयावहता के ीरे के समान हैं।
सरकार द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार:
नशे से पीड़ित लोगों के लिए देशभर में मात्र 349 एकीकृत पुनर्वास केंद्र (IRCA) हैं।
सरकारी अस्पतालों में केवल 154 व्यसन उपचार सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
मेरा मानना है कि जिस गति से यह समस्या बढ़ रही है, उसके मुकाबले यह मौजूदा व्यवस्थाएँ कतई पर्याप्त नहीं हैं।
चिंताजनक आंकड़े
पिछले पाँच वर्षों में नशा मुक्ति केंद्रों के माध्यम से लाभार्थियों की संख्या में भारी उछाल आया है। जहाँ 2020 में यह संख्या लगभग 2 लाख थी, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 7.98 लाख तक पहुँच गई है। लाभार्थियों की यह बढ़ती संख्या सीधे तौर पर यह दर्शाती है कि देश में नशे की समस्या कितनी तेजी से विकराल रूप ले रही है, जबकि सरकार की तैयारियाँ अब भी बेहद सीमित हैं।
मेरी सरकार से मांगें:
केवल जागरूकता अभियानों से इस लड़ाई को नहीं जीता जा सकता। मैंने सदन के माध्यम से सरकार के समक्ष निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
प्रत्येक जिले में पर्याप्त संख्या में नशा मुक्ति और पुनर्वास केंद्र स्थापित किए जाएं।
युवाओं में बढ़ती इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए एक विशेष और प्रभावी नीति बनाई जाए।
नशीली दवाओं और मादक पदार्थों की तस्करी पर कठोर रोक लगाई जाए।
राज्यों के साथ मिलकर उपचार, काउंसलिंग और पुनर्वास की एक मजबूत त्रि-स्तरीय व्यवस्था विकसित की जाए।
देश के युवाओं को नशे की गिरफ्त से बचाना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। युवा सुरक्षित होंगे, तभी देश का भविष्य सुरक्षित होगा।